Monday, May 23, 2011

The Journey From Bicycle To Plane


प्यार वो नहीं जिसमे जीत या हार हो , प्यार वो नहीं जो हर वक़्त तैयार हो 
प्यार तो वो है जिसमे किसी के आने की उम्मीद ना, हो लेकिन फिर भी उसका इंतज़ार हो........................
प्यार और इंतज़ार का कनेक्शन बहुत पुराना रहा है पता था की हमारे ऑफिसर जी नहीं आने बाले हैं पर फिर भी इंतज़ार करने की जिद सी थी I बांद्रा वेस्ट प्लेटफ़ॉर्म के तीन घंटे ने जैसे अब तक की सारी यात्राब्रित्ति ही दिखा दी, जिंदगी के अब तक का सबसे बोझिल सफ़र जिसे हम SUFFER कर रहे थे I पहले तो मूड आया था की जी भर के उसे गालियाँ देती, पर जिसे प्यार करते है उसे कोई चोट कैसे पंहुचा सकते है तो उसकी तस्बीर बना डालीI जिंदगी के दो पहलु थे एक पे हम वहाँ थे  जहाँ पे हमारे सारे अपने हैं और दुसरे पहलु में वहाँ जहाँ पे हमारे ऑफिसर जी और  कुछ वैसे पराये जो पराये हो के भी अपने थेI सारे दोस्त जा चुके थे और हमें भी चलने को कहा पर हमारा मन जाने किस रास्तों को याद कर रहा थाI बचपन में हरेक शुक्रबार को एक बूढ़े बाबा आया करते थे, कोई सूफी संत थेI बड़ी सी सफ़ेद दाढ़ी थी उनकी, सर पे उजली गोल टोपी एक हाथ में मजीरा तो  दुसरे हाथ में पोटली और एक अजीब सा काले रंग का भिक्षा पात्र हुआ करता थाI जब कभी कुछ जिद करते तो माँ डराया करती थी की वो पोटली में बंद करके ले जायंगेI हमने एक दिन उनसे पूछ ही लिया की आप सच में बच्चो  को बंद करके ले जाते हैं क्या ? वो मुस्कुरा के बोले सिर्फ उन्ही बच्चो को ले जाते हैं जो बड़ो का कहना नहीं मानते हैI हम हमेशा ही उनकी पोटली देखते थे की आखिर उसमे कोई है की नहीं, पर कोई नहीं होता थाI एक दिन ऐसे ही भिक्षा मांगने आये थे,माँ कुछ दुसरे काम में व्यस्त थी की हम दोनों भाई बहन निकले I कुछ थके लग रहे थे वो , उनकी तबियत ख़राब थीI हमारे दरबाजे पे बैठ गए शायद आज इतनी शक्ति नहीं थी की भिक्षा मांग सकेंI मेरा छोटा भाई उनके सर पे हाथ रख के अपनी तोतली आवाज़ में बोला "दीदी बाबा तो बुथाल है"I  हमें लगा वो  बीमार हैं तो फिर भिक्षा कैसे मांगेगे फिर आईडिया आया, उनका मंजीरा लिया पोटली टांगी और बर्तन उनसे जबरदस्ती ले लिया फिर अपने ही घर के बाहर उसी अंदाज़ में मंजीरा बजाया और कहा " माई फकीर को कुछ दे दे अल्लाह ताला बरकत देगा तेरे बच्चे सुखी रहेंगे " एक चांटा मिला और बाबा को मिली फटकारI हम रोने लगे तो हमारा भाई भी रोने लगा, हमने यूँ ही रोते हुए कहा" मम्मी तुम्ही तो कहती हो की लोगों की हेल्प करनी चाहिये बाबा को बुखार है", और हम चल दिये भिक्षा मांगने अपनी गली मेंI माँ ने बाबा को खाना दिया फिर दवा भी दी और बाबा ने हमें ढ़ेर सारी दुआएँ दीIशुक्रबार को जल्दी ही homework ख़त्म कर लिया करते थे, बाबा के आने का इंतज़ार करते थे और उनका मंजीरा बजाया करते थेI जब दो- तीन शुक्रबार नहीं आये तो हमें कुछ अच्छा नहीं लगाI माँ को हमेशा पूछते थे की आये थे क्या माँ , माँ ने पापा से पता करने को कहा, पता चला की शहर छोड़ के कहीं चले गए हैंI आज मुंबई के इस platform पे बरबस ही उनकी याद क्यूँ आ गयी हमें समझ ही नहीं आया मन में बस इतना ही पुछा "बाबा को हमारी याद कभी नहीं आती क्या" की तभी माँ का फ़ोन आया खाना खाया की नहीं और बहुत सारे सबालI याद आया कल रात को चन्दन भैया ने marine drive के पास चिक्की खरीद दी थी अभी तक बैग में ही पड़ी हुई होगी निकाल के एक byte खा लिया ताकि अगली बार माँ को झूठ ना बोलना पड़ेI एक दिन हमारे स्कूल बस का excident हो गया था, किसी को कोई चोट तो नहीं आई थी पर माँ ने फिर बस से हमें जाने ही नहीं दियाI तब से रिक्शे में ही जाया करते थे, बड़ा बोरिंग लगता थाI कुछ क्लासमेट साईकल से स्कूल जाते थे तो हमारा भी मन करता था पर माँ को मनाने में एक साल लग गयेI मानी तब जब हमारे मोहल्ले में मिश्र जी के यहाँ नए किरायेदार की बेटी का हमारे स्कूल में admission हुआI वो साईकल से जाती थी हमारी ही क्लासमेट थी हमारी नोट कॉपी और किताबें जो स्कूल में छुट जाया करती थी वो ला के घर पे दे जाया करती थी और हम as usual डांट खाया करते थेI फिर भी वो हमें अच्छी लगती थी, हम दोनों अपनी साईकल से साथ ही स्कूल जाया करते थेI एक दिन गये तो आंटी ने कहा की वो स्कूल नहीं जाएगी तबियत ख़राब है उसकीI रोज़ ही उसके घर पूछने जाया करते थे की स्कूल कब से जाएगीI हमारी कॉपी किताबे पहले की तरह ही खोने लगी, मन नहीं करता था की उसके बिना साईकल से जायेI एक सुबह स्कूल के लिये तैयार हो के उसके घर के तरफ निकले ही थे की अंदर से रोने की आवाज़ आ रही थी, इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए की उस क्रंदन को हम देखने जा पातेI बैठे-बैठे प्लेटफ़ॉर्म पे यूँ ही ऑंखें भर आयीं I ट्रेन आ-जा रही थी की तभी पापा का फोन आया, पुछा कहा हो exam कैसा गयाI रोना तो आ ही रहा था, वैसे  ही बोल पड़े बहुत ख़राब गया है पापाI शायद सिसकिया सुनाई दे गयी होगी तो दिलासा देते हुए बोले मेरी रानी बेटी को बहुत बड़ा बनना है, अरे ये तो छोटा सा जॉब था मेरा मन भी नहीं थाI मुंबई घुमे की नहीं? हमने जबाब में कह दिया कल हाजी अली और marine drive गये थे, आज kolkata चले जायेंगे कल interview हैI दोपहर के ढाई बज रहे थे और हमें वो पल याद आ रहा  था जब कॉलेज में इस वक़्त practicals हुआ करते थेI Ecology की practical field में हुआ करती थी सर लोग आते नहीं थे और हम बच्चे मस्ती करते थेI एक दिन हमारे एक college-mate  ने हमें bike चलाने का challenge दियाI पहले कभी चलाया नहीं था लेकिन लगा की ये भी तो दो पहिये की ही है चल ही जाएगीI उसे ही पीछे बैठा के चलाने लगे,एसिलेटर गियर स्पीड सब सही जा रहा थाI वैसे तो सब ठीक ही रहता अगर बीच में पोल ना आया होता हमें समझ ही नहीं आई की हम ब्रेक कैसे ले हमने पूछा की यार ब्रेक कहाँ है तब  तक तो पोल गाड़ी से लड़ गयी I बेचारे का हाथ काट गयाI बड़ा Embarassing moment था पर कहते भी क्या बस ये कहा की आगे से कभी हमें challenge मत करना नुकसान तुम्हारा ही होगाI कोचिंग क्लास में सबा और उसके भाई युसूफ आया करते थे उन्हें बहुत अच्छी bike चलाने आती थीI हम और सबा सन्डे को bike चलाना सीखा करते थे उनसे और वो भी बहुत मेहनत से सिखाते थेI पापा को अपनी स्कूटर प्रिया काफी प्रिय थी बहुत मुश्किलों के बाद हमने उन्हें bike खरीदने के लिये convince किया सोंचा युसूफ भाई और सबा छुट्टियों के बाद आयेंगे तो उन्हें Surprise देंगेI classes शुरू हो चुकी थी पर वो दोनों नहीं आ रहे थे तभी एक दिन सबा आई पर हमेशा के लिये जाने के लियेI हमने युसूफ भाई के बारे में पूछा तो पता चला की उनकी अम्मी और युसूफ भाई अब  नहीं रहे और वो अब पटना छोड़ के अपने खाला के यहाँ जा रही है उन्ही के साथ रहेगी अबI कह के वो चुप हो गयी और हम कुछ बोल ही नहीं पाएI तभी हमारे मोबाइल ने चुप्पी तोड़ी, बाबुल मामा का फ़ोन था खाने पे हमारा wait कर रहे थे गुस्सा होने लगे की एक दिन के लिये मुंबई आई हो फिर भी लग नहीं रहा की हमलोग खाना आज साथ खा पाएंगे, जल्दी आओI पर हमारे यादों  की तस्बीर अभी पूरी नहीं हुई थीI वंदना की death के बाद माँ ने स्कूल change करा दियाI Economics पढना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता थाI नोट कॉपी पे फूल बनाया करते थे क्लास में पर नए स्कूल में नीता मैडम बहुत ही अच्छी थीI Economics में BHU की गोल्ड मेडलिस्ट थी उन्हें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था की हम उनकी क्लास में बिलकुल  भी ध्यान नहीं देतेI हमें अपने घर पे अलग से बुला के पढाया करती थी कभी कभी हाथों से बना खाना भी खिला दिया करती थी और देखती की हमे बिलकुल भी पढने में मन नहीं लग रहा है तो साथ में पेंटिंग किया करती थीI नीता मैडम की छोटी सी लाल रंग की अल्टो थी वो खुद ही चलाया करती थीI हमें promise भी किया था की अगर हम 60 % से above मार्क्स Economics में  लायेंगे तो हमें भी चलाना सिखाएंगीI उन्होंने अपना वादा पूरा किया और हमने इस बार पहले ब्रेक मारना ही सीखाI उन्होंने बताया था की जब भी कुछ सामने दिखे तो होर्न बजाओ और ना हटे तो ब्रेक मार  के थोड़ी देर रुक जाओ हट जाये तो फिर आगे बढ़ोI एक दिन स्टेरिंग बाली सीट पे हम थे और बगल बाली सीट पे नीता मैडमI गाय कुत्ता आदमी सब होर्न बजा के पार अबकी सामने गढ्ढा आया होर्न बजाया हमने फिर ब्रेक भी मारा पर गढ्ढा तो हटा ही नहींI मैडम हमारी बाली सीट पे आ गयी और right turn करके गाड़ी आगे बढ़ाई I कुछ दिनों के बाद मैडम अपने बेटे के यहाँ foreign चली गयींI हमें लगा कुछ दिनों के लिये ही गयीं हैं बापस आ जाएँगीI दिन से महीने हो गये और महीनो से साल बीत गये ना तो उनकी कोई खबर आई और नाही वोI Platform पे बैठे बैठे 3:45pm हो चुके थे की तभी हमारे एक मित्र का फ़ोन आया "यार कहाँ  हो कितने बजे एअरपोर्ट के लिये निकलना है पता है ना की कही और जाने का इरादा है, यार निकलो वोहाँ से जल्दी वरना flight छुट जाएगी "I स्टेशन पे दो लेडिज police बड़े देर से हमें notice कर रही थी फिर आ के पूछती है कुछ भूल गयी है क्या, कहाँ जाना है? "The world's greatest magic is the art of smiling with eyes filled with tears" हमने मुस्कुराते हुए जबाब दिया 4 बजे  की जो लोकल बोरीबली जाती है ना उसी से जाना है कुछ भी नहीं भूले हम, काश की भूल पातेI कल सुबह जब मुंबई के लिये निकले थे तो माँ ने दो पुड़ियाँ जबरदस्ती खिला दी थी और काफी हिदायते भी दीI पापा एअरपोर्ट तक छोड़ने आये और समझा रहे थे किसी अजनबी से जयादा बात मत करना, connecting flight है तो  एअरपोर्ट के बाहर मत जाना, खाना खा लेना, पहुँच के फ़ोन करना इत्यादिI बादलों के बड़े बड़े गुच्छे जब मिलते थे तो ऐसा लगता था जैसे सपनों की दुनिया कोई अलग थोड़ी होती है यही तो है जहाँ अपनों का प्यार हैI कभी छोटे बादलों पे ड्राविंग रूम बनाते तो कभी बड़े बादलों पे डांस स्टेज I कल की सुबह जितनी सुहानी थी और आज की शाम उतनी ही बोझिल है सिर्फ एक इंसान की ना की बजह सेI ये जिन्दंगी के वोही गढ्ढे  है जहाँ पे हमें right turn लेना था और हम ब्रेक मारे बैठे थे की तभी हमारी दोस्त निशी का फ़ोन आया की ऑफिसर जी मिले क्या? अब  तक ऑफिसर जी की पूरी तस्बीर बन चुकी थीI उससे कहा हमने, "हाँ सामने ही है हम बाद में बात करते है ट्रेन आने बाली है " मुंबई एअरपोर्ट से जब flight उड़ी तो बस एक ही ख्याल आया की इस सफ़र में तो कोई भी हमारा अपना नहीं है फिर मन क्यूँ ढूँढता है, शायद इसलिए की  वो लोग जो दे गये है वो हमारी  खुद की ही प्रीत थी और अपनी चीज खोएगी तो मन ढूंढेगा नहीं क्या????


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1 comment:

being adventure said...

यार मुझे लगता हैं. की तुम्हारी जिंदगी कही किसी मोड पे रुक से गयी हैं. प्लीज़ उसे अपने अतीत में जाके फिर से प्ले करो.......अब मैं आप से छोटा हूँ. तो ज्यादा बड़ा डायलाग नहीं मारूंगा.