Sunday, June 26, 2011

B1-23:A HEARTSTRINGS MEET WITH DISTANT RAINBOW

जिंदगी कब क्या मोड़ ले कर आ जाये कुछ कहा  नहीं जा सकताI सब कुछ रूटीन से ही चल रहा था कल सुबह, माँ ने जब पूजा का प्रसाद दिया था तो इश्वर से हमने ये माँगा की हे इश्वर कितनी बोरिंग सी जिंदगी है सुबह उठो तो 11 :30 am तक competitive  सेट प्रक्टिस करो फिर 12 से 7 ऑफिस,  7:30 से 9 बजे प्रतियोगिता दर्पण पढना और फिर खाना खा के सो जानाI बक क्या बकबास है थोडा adventure होना चाहिये था God जीI उसी शाम ऑफिसर जी का फ़ोन आया, असल में उसकी मंजिल के रास्ते में इस बार हम थे तो हमें मिलने को पटना के स्टेशन पे बुलाया था उसनेI इश्वर शायद मजाक करने के मूड में थे इतनी जल्दी प्रार्थना सुन लेंगे हमे यकिन नहीं आ रहा थाI मुंबई प्लेटफ़ॉर्म के तीन घंटे याद आने लगे और लगा की यार हमारा ऑफिसर जी तो हमारे सपनों की दुनिया में है ऐसे कैसे आ जायेगा I उस दिन का हमारा सारा रूटीन फेल हो गया , शाम के 7 से  10 ये सोंचते रह गये की मिलने जाये की नहींI फिर लगा देश में प्रजातंत्र भी तो है दोस्तों से ही पूछ लेते है पर कुछ निष्कर्ष ही नहीं निकलाI रात के 12 :30 बज चुके थे पर नींद गायब थी की अचानक लगा एलेन है सामनेI हमने एलेन से कहा की जाने का मन नहीं है यार इस बार भी वो नहीं आएगा और सारे दोस्त मजाक बनायेंगे हमाराI उस पर एलेन कहता है की लोगों की कब से फ़िक्र होने लगी? तुम्हारा ऑफिसर जी खुद ही आ  रहा है और तुम भाग रही हो इस सच से की कोई ऑफिसर जी है भी इस दुनिया मेंI जिन चीजो से जितना भागोगी वो उतना ही परेशानी का शबब होगा सामना करो और ऑफिसर जी को अपने सपनों की दुनिया दिखाओI फिर क्या था मूड में आ गये हम भी, पूरी रात तो आँखों में बीत गयीI सुहाबनी सुबह अपनी कहानी की सुरुआत करने लगींI रविवार का दिन था सो सुबह डांस क्लास जाने को तैयार हो गये माँ को बोल दिया आज शाम को देर हो जाएगी तो माँ ने खीर बना के टिफिन बैग में डाल दियाI पडोशी के घर से टीवी की आवाज आ रही थी, रंगोली प्रोग्राम में आज उनसे पहली मुलाकात होगी बाला गाना बज रहा था और हमें हँसी आ रही थीI डांस क्लास गये तो कृष्णराधायण  का  टुकड़ा सिखाया जा रहा थाI हम आज कृष्ण का पार्ट प्ले कर रहे थेI राधा को कंकरी मार के गगरी तोडनी थी, पहले भी किया था हमने पर आज पता नहीं क्यों, हो ही नहीं रहा थाI गुरु जी ने कहा की मन में ये सोंचो की वोहाँ सचमुच राधा है और तुम कृष्ण हो और गगरी तोडनी है पर जैसे ही सोंचते कोई और दीखता थाI कंकरी मारते भी तो कैसे उसे चोट नहीं लग जाती क्या ? चर्च गये तो कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा थाI 2 घंटे सिर्फ ईशु की तस्बीर पर ऑंखें टिकी रहीI जाते वक़्त मिसिज  मोरिसन से ये पूछा की आपके husband तो deffence में है उन्हें कौन सा केक अच्छा लगता है? थोडा शर्मा के बोलीं फ्रूट केक I चुकी जीने के लिये एक ही दिन रविवार ही मिलता है ऑफिस बालों को सो काफी busy schedule था इस दिन का, दोस्तों से भी मिलना था I जब ऑटो के पैसे देने के लिये वालेट  ढूँढा तो पता चला घर पे ही भूल आये है I अब दोस्तों की बारी थी किसी ने जरबेरा के flower bunch खरीद दिये तो कोई केक खरीदने साथ गयाI केक बाले को फ्रूट केक ही पैक करने को कहा हमने तो उसने पूछा लिखना क्या है केक पेI हमने कहा Happy valentine Day लिख दीजिये तो मेरा दोस्त और केक बाला मेरी तरफ  आश्चर्यचकित निगाहों से देखने लगेI उन्हें शायद जून में valentine डे समझ नहीं आ रही थीI हद ही है दुनिया भी , प्यार क्या किसी दिन का मोहताज होता है, प्यार में तो हर पल ही valentine पल होता हैI Red rose के लिये भी खासी मस्सकत करनी पड़ गयीI किसी अनजान से घर के compound में बहुत सारा गुलाब देखा सोंचा यही देंगेI दौड़ता हुआ कुत्ता तब दिखा जब अनाधिकार ही compound में अंदर तक जा चुके थे और वो हमें काटने को दौड़ा ही थाI दोस्तों ने कैसे कैसे manage किया उस कुत्ते को, हम लिख नहीं पा रहे हैI हमारा सारा का सारा खीर उसे खिला दियाI खैर Red Rose operation successful रहा, तोड़ के हमने बैग में डाल लियाI 3 :30pm  बज चुके थे और ट्रेन नहीं आई थी अब  तकI बहुत प्यास भी लग रही थी की तभी हमारे एक मित्र ने पानी बाद में दिया पहले कलमा पढने लगे " ये इश्क नहीं आसान इतना तो समझ लीजे , एक आग का दरिया है और डूब के जाना है"I जब ट्रेन प्लेटफार्म पे रुकी तो दोस्त हमें ऐसे भेज रहे थे जैसे की हम कोई जंग लड़ने जा रहे  हैI साथ चलने को कहा तो कहने लगे पता नहीं ये केक खाया जायेगा या मारा जायेगाI तुम जाओ कुछ इस तरह का हुआ तो बाद में हमलोग कवर करेंगेI ब्रह्मपुत्र मेल के B1 कोच के 23 नंबर सीट पे हमारे ऑफिसर जी अपने लैपटॉप पे गाने सुन रहे थेI सारे दोस्त कहते है की हम किसी को अपने सामने बोलने ही नहीं देते पर सच कहते है 10 मिनट के वक्त में हमने पहले 5 मिनट उसे अपनी सुनाने को कहीI अभी दो ही मिनट हुए थे की उसकी बात खत्म हो गयी और उसने बड़े मासूमियत से  कहा " बस इतना ही, बड़ा बोरिंग हु यार मैं तुम अपनी सुनाओ "I  हमारी तो पूरी दास्ताँ थीI समझ नहीं आ रहा था की क्या कहे और क्या छोड़े की तभी cake और candle पे ध्यान गया I हमने उससे पहला सवाल किया lighter है क्या तो उसने कहा मैं सिगरेट नहीं पीताI मन में ही कहा हमने, हम भी नहीं पीते candle जलाने के लिये मांग रहे हैं बुद्धू की तभी वहाँ बैठे एक मणिपुरी भाई साहब ने माचिस दीI हमने दोस्तों का दिया हुआ flower bunch उसे दे दियाI केक का डब्बा खोला तो valentine डे जो लिखाबाया था हमने वो शायद Red Rose operation में प्लेन हो चुका थाI खैर हमने साथ में केक काटा, background में कोई असामी गाना बज रहा थाI हमें तो समझ नहीं आ रहा था पर  ये musical moment बड़ा अच्छा लग रहा थाI वहाँ पे बैठे अन्य यात्रियों ने जी ऑफिसर जी से बर्थडे विश करते हुए पूछा आपका आज बर्थडे है? बड़े रूमानी अंदाज़ में कहता है की हमें भी अभी-अभी ही पता चला हैI हम तो पता नहीं कहा खो गये थे धयान तब आया जब ट्रेन खुल चुकी थी  और दोस्तों के फ़ोन आने लगे थे I हमने मोबाइल silent कर दियाI ट्रेन खुली तो हमें ध्यान आया की पैसे तो है नहीं सिर्फ बैग में क्रेडिट कार्ड है, हमने ऑफिसर जी से ही पूछ लिया की टीटी लोग पकड़ने पे क्रेडिट कार्ड लेते है क्या ? उसने बड़ा simple सा जबाब दिया, पर cash कैसे  करेंगेI काफी बातें हुईं , गाड़ी अगले स्टेशन पटना साहिब  में रुकने ही बाली थीI Sindrella की तरह शायद सपनों की दुनिया से बापस आने का हमारा भी वक़्त हो चला थाI ट्रेन से उतरते वक़्त हमने Red Rose अपने ऑफिसर जी को दे दियाI उसका चेहरा कुछ उदास लग रहा थाI वो ट्रेन से नीचे उतर आया था, शायद कुछ दुबिधा में थाI ऐसे उदास अपने ऑफिसर जी को कैसे जाने देते, बापस आते वक़्त हमने इतना ही कहा " ऐसी भूतों जैसी शकल क्यूँ बना ली तुमने, बुरे दिख रहे हो keep smiling always & Happy Journey" I वो दो पल को जैसे ही मुस्कुराया उसका मुस्कुराता चेहरा हमने अपने आँखों में भर लिया और मुड गये, दोबारा पलट के एक बार भी नहीं देखाI हमारे  दोस्त तब तक काफी कॉल कर चुके थेI चलते- चलते मंदिर दिखा इंतज़ार करने लगे दोस्तों के आने का वालेट  जो नहीं था पास मेंI तूफान के आने की बाद बाली शांति थी जैसे , इस दो पल की दास्ताँ में क्या गया क्या बचा समझ ही नहीं आया और ना हमने समझने की कोशिश कीI जिंदगी के इस पल के लिये अपने दोस्तों को, अपने ऑफिसर जी को और इश्वर को मन ही मन धन्यवाद दिया बस I 

Monday, May 23, 2011

The Journey From Bicycle To Plane


प्यार वो नहीं जिसमे जीत या हार हो , प्यार वो नहीं जो हर वक़्त तैयार हो 
प्यार तो वो है जिसमे किसी के आने की उम्मीद ना, हो लेकिन फिर भी उसका इंतज़ार हो........................
प्यार और इंतज़ार का कनेक्शन बहुत पुराना रहा है पता था की हमारे ऑफिसर जी नहीं आने बाले हैं पर फिर भी इंतज़ार करने की जिद सी थी I बांद्रा वेस्ट प्लेटफ़ॉर्म के तीन घंटे ने जैसे अब तक की सारी यात्राब्रित्ति ही दिखा दी, जिंदगी के अब तक का सबसे बोझिल सफ़र जिसे हम SUFFER कर रहे थे I पहले तो मूड आया था की जी भर के उसे गालियाँ देती, पर जिसे प्यार करते है उसे कोई चोट कैसे पंहुचा सकते है तो उसकी तस्बीर बना डालीI जिंदगी के दो पहलु थे एक पे हम वहाँ थे  जहाँ पे हमारे सारे अपने हैं और दुसरे पहलु में वहाँ जहाँ पे हमारे ऑफिसर जी और  कुछ वैसे पराये जो पराये हो के भी अपने थेI सारे दोस्त जा चुके थे और हमें भी चलने को कहा पर हमारा मन जाने किस रास्तों को याद कर रहा थाI बचपन में हरेक शुक्रबार को एक बूढ़े बाबा आया करते थे, कोई सूफी संत थेI बड़ी सी सफ़ेद दाढ़ी थी उनकी, सर पे उजली गोल टोपी एक हाथ में मजीरा तो  दुसरे हाथ में पोटली और एक अजीब सा काले रंग का भिक्षा पात्र हुआ करता थाI जब कभी कुछ जिद करते तो माँ डराया करती थी की वो पोटली में बंद करके ले जायंगेI हमने एक दिन उनसे पूछ ही लिया की आप सच में बच्चो  को बंद करके ले जाते हैं क्या ? वो मुस्कुरा के बोले सिर्फ उन्ही बच्चो को ले जाते हैं जो बड़ो का कहना नहीं मानते हैI हम हमेशा ही उनकी पोटली देखते थे की आखिर उसमे कोई है की नहीं, पर कोई नहीं होता थाI एक दिन ऐसे ही भिक्षा मांगने आये थे,माँ कुछ दुसरे काम में व्यस्त थी की हम दोनों भाई बहन निकले I कुछ थके लग रहे थे वो , उनकी तबियत ख़राब थीI हमारे दरबाजे पे बैठ गए शायद आज इतनी शक्ति नहीं थी की भिक्षा मांग सकेंI मेरा छोटा भाई उनके सर पे हाथ रख के अपनी तोतली आवाज़ में बोला "दीदी बाबा तो बुथाल है"I  हमें लगा वो  बीमार हैं तो फिर भिक्षा कैसे मांगेगे फिर आईडिया आया, उनका मंजीरा लिया पोटली टांगी और बर्तन उनसे जबरदस्ती ले लिया फिर अपने ही घर के बाहर उसी अंदाज़ में मंजीरा बजाया और कहा " माई फकीर को कुछ दे दे अल्लाह ताला बरकत देगा तेरे बच्चे सुखी रहेंगे " एक चांटा मिला और बाबा को मिली फटकारI हम रोने लगे तो हमारा भाई भी रोने लगा, हमने यूँ ही रोते हुए कहा" मम्मी तुम्ही तो कहती हो की लोगों की हेल्प करनी चाहिये बाबा को बुखार है", और हम चल दिये भिक्षा मांगने अपनी गली मेंI माँ ने बाबा को खाना दिया फिर दवा भी दी और बाबा ने हमें ढ़ेर सारी दुआएँ दीIशुक्रबार को जल्दी ही homework ख़त्म कर लिया करते थे, बाबा के आने का इंतज़ार करते थे और उनका मंजीरा बजाया करते थेI जब दो- तीन शुक्रबार नहीं आये तो हमें कुछ अच्छा नहीं लगाI माँ को हमेशा पूछते थे की आये थे क्या माँ , माँ ने पापा से पता करने को कहा, पता चला की शहर छोड़ के कहीं चले गए हैंI आज मुंबई के इस platform पे बरबस ही उनकी याद क्यूँ आ गयी हमें समझ ही नहीं आया मन में बस इतना ही पुछा "बाबा को हमारी याद कभी नहीं आती क्या" की तभी माँ का फ़ोन आया खाना खाया की नहीं और बहुत सारे सबालI याद आया कल रात को चन्दन भैया ने marine drive के पास चिक्की खरीद दी थी अभी तक बैग में ही पड़ी हुई होगी निकाल के एक byte खा लिया ताकि अगली बार माँ को झूठ ना बोलना पड़ेI एक दिन हमारे स्कूल बस का excident हो गया था, किसी को कोई चोट तो नहीं आई थी पर माँ ने फिर बस से हमें जाने ही नहीं दियाI तब से रिक्शे में ही जाया करते थे, बड़ा बोरिंग लगता थाI कुछ क्लासमेट साईकल से स्कूल जाते थे तो हमारा भी मन करता था पर माँ को मनाने में एक साल लग गयेI मानी तब जब हमारे मोहल्ले में मिश्र जी के यहाँ नए किरायेदार की बेटी का हमारे स्कूल में admission हुआI वो साईकल से जाती थी हमारी ही क्लासमेट थी हमारी नोट कॉपी और किताबें जो स्कूल में छुट जाया करती थी वो ला के घर पे दे जाया करती थी और हम as usual डांट खाया करते थेI फिर भी वो हमें अच्छी लगती थी, हम दोनों अपनी साईकल से साथ ही स्कूल जाया करते थेI एक दिन गये तो आंटी ने कहा की वो स्कूल नहीं जाएगी तबियत ख़राब है उसकीI रोज़ ही उसके घर पूछने जाया करते थे की स्कूल कब से जाएगीI हमारी कॉपी किताबे पहले की तरह ही खोने लगी, मन नहीं करता था की उसके बिना साईकल से जायेI एक सुबह स्कूल के लिये तैयार हो के उसके घर के तरफ निकले ही थे की अंदर से रोने की आवाज़ आ रही थी, इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए की उस क्रंदन को हम देखने जा पातेI बैठे-बैठे प्लेटफ़ॉर्म पे यूँ ही ऑंखें भर आयीं I ट्रेन आ-जा रही थी की तभी पापा का फोन आया, पुछा कहा हो exam कैसा गयाI रोना तो आ ही रहा था, वैसे  ही बोल पड़े बहुत ख़राब गया है पापाI शायद सिसकिया सुनाई दे गयी होगी तो दिलासा देते हुए बोले मेरी रानी बेटी को बहुत बड़ा बनना है, अरे ये तो छोटा सा जॉब था मेरा मन भी नहीं थाI मुंबई घुमे की नहीं? हमने जबाब में कह दिया कल हाजी अली और marine drive गये थे, आज kolkata चले जायेंगे कल interview हैI दोपहर के ढाई बज रहे थे और हमें वो पल याद आ रहा  था जब कॉलेज में इस वक़्त practicals हुआ करते थेI Ecology की practical field में हुआ करती थी सर लोग आते नहीं थे और हम बच्चे मस्ती करते थेI एक दिन हमारे एक college-mate  ने हमें bike चलाने का challenge दियाI पहले कभी चलाया नहीं था लेकिन लगा की ये भी तो दो पहिये की ही है चल ही जाएगीI उसे ही पीछे बैठा के चलाने लगे,एसिलेटर गियर स्पीड सब सही जा रहा थाI वैसे तो सब ठीक ही रहता अगर बीच में पोल ना आया होता हमें समझ ही नहीं आई की हम ब्रेक कैसे ले हमने पूछा की यार ब्रेक कहाँ है तब  तक तो पोल गाड़ी से लड़ गयी I बेचारे का हाथ काट गयाI बड़ा Embarassing moment था पर कहते भी क्या बस ये कहा की आगे से कभी हमें challenge मत करना नुकसान तुम्हारा ही होगाI कोचिंग क्लास में सबा और उसके भाई युसूफ आया करते थे उन्हें बहुत अच्छी bike चलाने आती थीI हम और सबा सन्डे को bike चलाना सीखा करते थे उनसे और वो भी बहुत मेहनत से सिखाते थेI पापा को अपनी स्कूटर प्रिया काफी प्रिय थी बहुत मुश्किलों के बाद हमने उन्हें bike खरीदने के लिये convince किया सोंचा युसूफ भाई और सबा छुट्टियों के बाद आयेंगे तो उन्हें Surprise देंगेI classes शुरू हो चुकी थी पर वो दोनों नहीं आ रहे थे तभी एक दिन सबा आई पर हमेशा के लिये जाने के लियेI हमने युसूफ भाई के बारे में पूछा तो पता चला की उनकी अम्मी और युसूफ भाई अब  नहीं रहे और वो अब पटना छोड़ के अपने खाला के यहाँ जा रही है उन्ही के साथ रहेगी अबI कह के वो चुप हो गयी और हम कुछ बोल ही नहीं पाएI तभी हमारे मोबाइल ने चुप्पी तोड़ी, बाबुल मामा का फ़ोन था खाने पे हमारा wait कर रहे थे गुस्सा होने लगे की एक दिन के लिये मुंबई आई हो फिर भी लग नहीं रहा की हमलोग खाना आज साथ खा पाएंगे, जल्दी आओI पर हमारे यादों  की तस्बीर अभी पूरी नहीं हुई थीI वंदना की death के बाद माँ ने स्कूल change करा दियाI Economics पढना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता थाI नोट कॉपी पे फूल बनाया करते थे क्लास में पर नए स्कूल में नीता मैडम बहुत ही अच्छी थीI Economics में BHU की गोल्ड मेडलिस्ट थी उन्हें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था की हम उनकी क्लास में बिलकुल  भी ध्यान नहीं देतेI हमें अपने घर पे अलग से बुला के पढाया करती थी कभी कभी हाथों से बना खाना भी खिला दिया करती थी और देखती की हमे बिलकुल भी पढने में मन नहीं लग रहा है तो साथ में पेंटिंग किया करती थीI नीता मैडम की छोटी सी लाल रंग की अल्टो थी वो खुद ही चलाया करती थीI हमें promise भी किया था की अगर हम 60 % से above मार्क्स Economics में  लायेंगे तो हमें भी चलाना सिखाएंगीI उन्होंने अपना वादा पूरा किया और हमने इस बार पहले ब्रेक मारना ही सीखाI उन्होंने बताया था की जब भी कुछ सामने दिखे तो होर्न बजाओ और ना हटे तो ब्रेक मार  के थोड़ी देर रुक जाओ हट जाये तो फिर आगे बढ़ोI एक दिन स्टेरिंग बाली सीट पे हम थे और बगल बाली सीट पे नीता मैडमI गाय कुत्ता आदमी सब होर्न बजा के पार अबकी सामने गढ्ढा आया होर्न बजाया हमने फिर ब्रेक भी मारा पर गढ्ढा तो हटा ही नहींI मैडम हमारी बाली सीट पे आ गयी और right turn करके गाड़ी आगे बढ़ाई I कुछ दिनों के बाद मैडम अपने बेटे के यहाँ foreign चली गयींI हमें लगा कुछ दिनों के लिये ही गयीं हैं बापस आ जाएँगीI दिन से महीने हो गये और महीनो से साल बीत गये ना तो उनकी कोई खबर आई और नाही वोI Platform पे बैठे बैठे 3:45pm हो चुके थे की तभी हमारे एक मित्र का फ़ोन आया "यार कहाँ  हो कितने बजे एअरपोर्ट के लिये निकलना है पता है ना की कही और जाने का इरादा है, यार निकलो वोहाँ से जल्दी वरना flight छुट जाएगी "I स्टेशन पे दो लेडिज police बड़े देर से हमें notice कर रही थी फिर आ के पूछती है कुछ भूल गयी है क्या, कहाँ जाना है? "The world's greatest magic is the art of smiling with eyes filled with tears" हमने मुस्कुराते हुए जबाब दिया 4 बजे  की जो लोकल बोरीबली जाती है ना उसी से जाना है कुछ भी नहीं भूले हम, काश की भूल पातेI कल सुबह जब मुंबई के लिये निकले थे तो माँ ने दो पुड़ियाँ जबरदस्ती खिला दी थी और काफी हिदायते भी दीI पापा एअरपोर्ट तक छोड़ने आये और समझा रहे थे किसी अजनबी से जयादा बात मत करना, connecting flight है तो  एअरपोर्ट के बाहर मत जाना, खाना खा लेना, पहुँच के फ़ोन करना इत्यादिI बादलों के बड़े बड़े गुच्छे जब मिलते थे तो ऐसा लगता था जैसे सपनों की दुनिया कोई अलग थोड़ी होती है यही तो है जहाँ अपनों का प्यार हैI कभी छोटे बादलों पे ड्राविंग रूम बनाते तो कभी बड़े बादलों पे डांस स्टेज I कल की सुबह जितनी सुहानी थी और आज की शाम उतनी ही बोझिल है सिर्फ एक इंसान की ना की बजह सेI ये जिन्दंगी के वोही गढ्ढे  है जहाँ पे हमें right turn लेना था और हम ब्रेक मारे बैठे थे की तभी हमारी दोस्त निशी का फ़ोन आया की ऑफिसर जी मिले क्या? अब  तक ऑफिसर जी की पूरी तस्बीर बन चुकी थीI उससे कहा हमने, "हाँ सामने ही है हम बाद में बात करते है ट्रेन आने बाली है " मुंबई एअरपोर्ट से जब flight उड़ी तो बस एक ही ख्याल आया की इस सफ़र में तो कोई भी हमारा अपना नहीं है फिर मन क्यूँ ढूँढता है, शायद इसलिए की  वो लोग जो दे गये है वो हमारी  खुद की ही प्रीत थी और अपनी चीज खोएगी तो मन ढूंढेगा नहीं क्या????


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Saturday, January 15, 2011

किस रंग से मैं रंग लूँ चुनरिया !!!!!!!!!!!!!!!


जिंदगी सच में एक पहेली की तरह है जितनी आसान तरीके से जीने की कोशिश करो उतनी ही बेईमान होती जाती हैI मन की कोरी चुनरिया लिये इस दूनियाँ के सप्तरंगो को देखती हूँ पर अभी तक समझ नहीं पायी किस रंग से मैं अपनी चुनर रंग लूँ I
अभी कुछ दिन पहले ही स्टेट बैंक ज्वाइन किया है लोगों के बीच इतना स्नेह अभी तक के workplace जहाँ भी मैंने काम किया है, वहाँ पे कभी देखा नहीं था तो यहाँ मैं बिलकुल स्तब्ध रह गयी I युवाओं के बीच ये बैंक बिलकुल ही orthodox माना जाता रहा है पर सच कुछ और ही मिलाI कम से कम मैंने जो ब्रांच ज्वाइन किया है उसका तो हैI लोग ऐसे बातें करते हैं जैसे कोई अपना ही हो I जहाँ एक तरफ corporate की नई मृदंग पर आज के युवा चमकीली जंजीरों पर नृत्य करते हैं, यहाँ देखती हूँ की इतनी आत्मीयता है अपने काम के प्रति की जो लोग retire होने वाले है उन्हें अभी से ही अपनों की जुदाई का गम हैI कल हमारे बैंक में एक employee का जन्मदिन था I शाम को हमने मिल के उनका जन्मदिन मनाया तो वो रो पड़े, कहा "मेरे बच्चे मेरा जन्मदिन भूल जाते है मेरी श्रीमती जी भी भूल जाती हूँ पर मेरा ये दोस्त स्टेट बैंक कभी नहीं भूलता बिटिया , सोंचता हूँ की दो साल बाद कैसे कटेगी जिंदगी "I कह नहीं सकती उस बिटिया शब्द में कैसी सतरंगी छठा थी, एक दारुण दृश्य था बस जो कभी corporate की अश्लील पार्टियों में नहीं देखी अब तक I
यूँ तो पटना की सड़के कितनी अच्छी है ये सभी पटनावासी जानते ही होंगे पर रास्तों से कुछ अजीब सा लगाव हो गया हैI यादें ऐसी हैं की चलो तो पता ही नहीं चलता की आप कहाँ आ गएI यूँ ही एक दिन देखा की डोम टोली में तमाशबीनो की बड़ी भीड़ हैI पास गयी तो लोगों ने बताया "नीच की बस्ती है रोज़ का बखेड़ा है इनका तो मैडम जी " I क्या देखती हूँ एक आदमी अपनी औरत को बड़ी बेदर्दी से पीट रहा था और लोग शुरु से अभी तक सिर्फ मजे ही ले रहे थेI मुझे समझ नहीं आया की आखिर वो औरत पत्थर है या वो सारे लोग जो ये तमाशा देख रहे हैं की तभी मन में क्या आया मैंने एक पत्थर जोर से उस आदमी पर छुप के दे माराI विडम्बना ऐसी की पत्थर आदमी को नहीं लगकर उस औरत को ही लग गयी I उसके बाद तो जैसे चमत्कार ही हो गया वो आदमी अपनी पत्नी को छोड़ कर भीड़ से लड़ पड़ा और उसके जख्म देखने लगाI तभी भीड़ से आवाज़ आई " नौटंकी करता है साला, सब पाकेटमारी का धंधा है "I सबने अपनी राह ली और मैंने भी, पर इस रंगीन दुनिया के इतने भद्दे रंग समझ से परे रहेI पुरे रास्ते ये सोंचती आई की अगर लोगों को पता है की ऐसी जगहों पर पाकेटमारी होती है तो भीड़ लगाकर बढ़ाबा ही क्यूँ देते हैI क्या दुनिया है पेट के लिये पीटना और पीटाना पड़ता है I
एक बहुत ही खूबसूरत गाने की लाइन सुनी थी " तू भी तो तडपा होगा मन को बनाकर", कभी यूँ ही ख्याल आता है सब मशीन ही क्यूँ ना हो गए इस मन की क्या जरूरत थी भगवान ? मेरे एक परम प्रिय मित्र ने बहुत ही समझाया मुझे की यार लोगों का मत सोंच, थोडा selfish हो जा जिंदगी फिलोसफी से नहीं चलती पर क्या ये सही है की ह़र कदम हम अपना मतलब निकलने के लिये अपनी आत्मा से खेले या फिर जड़ हो जाएँ तो फिर इंसान रह पायेगे क्या ????