Monday, September 13, 2010

मंजिलें और भी हैं

ऐसा कई बार होता है जिंदगी में जब लगता है कि अरे ये तो पहले भी हुआ थाI रंगमंच वही रहता है, सिर्फ किरदार बदलते हैंI कई बार चीजे शुरू से शुरु करनी होती हैं, आज फिर एक ऐसा ही दिन हैI यूँ तो पीछे मुड़ के रास्ते मैंने नहीं देखे पर ये जरूर देखती हूँ कि कौन से बाले रास्ते अभी चलने को बाकी रह गयें है क्योंकि :-
रोने से तक़दीर बदलती नहीं,
वक़्त से पहले रात भी ढ़लती नहीं,
दूसरों कि कामयाबी लगती आसां,
मगर कामयाबी रास्ते में पड़े मिलती नहीं,
मिल जाती कामयाबी अगर इत्तिफाक से,
ये भी सच है वो पचती नहीं,
कामयाबी पाना है पानी में आग लगाना,
पानी में आग आसानी से लगती नहीं,
राहें रुकने से पहले सोंचों ऐ दोस्तों,
अपने आप कोई जिंदगी सबरती नहीं!!!!!!!!!!!!
मेरा छोटा भाई हमेशा ही मेरी सड़ी कबितायें बर्दाश्त करता है और उसको सुधारता हैI बोर्ड exams के रिजल्ट आये थे कि तभी एक दिन जब ये कविता उसे सुनाई तो उसने कहा छपने लायक है,खुश हो के पापा को भी सुनाया पर उसके बाद जो मैंने सुना वो बहुत ही ह्रदय-विदारक थाI पापा ने कहा आखिर करना क्या चाहती हो तुम जिंदगी मेंI अगर यही सब करोगी तो पढने का वक़्त निकल जायेगा, कोई लक्ष्य भी है या यही सब आवारागर्दी करनी हैI मैंने उनसे ज्यादा गुस्से में कहा मुझे classical dancer बनना है पुरे विश्व में तिरंगा लहराना है और क्याI पापा समझाते हुए कहने लगे सपनो में जीने से कुछ नहीं होता, देखो मनोज को, कितना बेहतरीन तबला बजाता है पर घर में खाने के भी लाले पड़े हैंI जीने के लिये कला या सपनों कि नहीं बेटा पैसे कि जरूरत होती है इसलिए जा के पढाई कीजिये और इंटर में अच्छे मार्क्स ला के दिखाईये तभी कुछ अच्छा कर पाइयेगाI
उस दिन समझ आया कि हमारा समाज ये मानता है कि जिसके पास जितना पैसा है वो उतना ही सुखी है पर क्या भौतिक सुख सुबिधायें मन को शांति दिला सकतीं हैंI आज भी जान डांस पे अटकी हुई है मंजिल वही है पर माँ पापा ने कुछ और ही सोंच रखा था मेरे लिये शायदI मैंने तब तय किया कि कुछ मंजिलें और भी है जो पाना है अपने लिये नहीं अपनों के लियेI १२वी कि परीक्षा सर पे थी और मैं कालिदास रंगालय में अभिज्ञान शाकुंतलम प्ले कि तयारी कर रही थी, तभी मेरी माता जी अचानक से आ गयीं वहाँ और कसम दी कि जब तक अपने पैरों पे खड़ी ना हो जाऊं इस तरह कि वाहियात चीजों में अपने आपको बर्बाद नहीं कर सकतीI माँ के प्यार और फटकार ने घूँघरू छीन लियेI खैर १२वी कि परीक्षा दी और मेरे करियर कि चिंता लोगों को सताने लगी खास कर माँ पापा कोI science से इंटर करने के बाद भारत में लोगो को दो ही profession चुम्बक कि तरह अकर्षित करती है या तो डॉक्टर या तो इंजिनियरI चूँकि घर में सब health department से हैं और bio background इंटर किया था मैंने तो लोगो को लगता था मैं डॉक्टर बनुगीI अब लोगों को लगने में क्या है पर जिसे physics झेलना पड़ता है ना उसे ही पता चलता हैI लगता है, साले scientist लोग पैदा ही नहीं होते तो कितना अच्छा होताI कठिन तपस्या से physics झेलने के बाद veterinary college में admission कि बात आई, तो डॉक्टर बनने से पहले ही मरीजों बाली स्थिति हो गयीI मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल का खाना खा के बीमार पड़ गयी फिर भी चार महीने तक मैंने मेडिकल कॉलेज झेला या फिर कॉलेज बाले मुझे झेल रहे थेI Anatomy or Physiology कि classes में मरी भैंस सामने होती थी,बड़ी- बड़ी हड्डियाँ देख के लगा कि यार किस मुर्देखाने में आ गयी मैंI जब dissection classes होते तो बहुत दया आती थी अपने आप पे और उस मरे हुए object पेI लगा जैसे दम घुटता हो, यार जब मरे हुए जानबरों का कुछ कर नहीं सकती तो जिन्दे का क्या भला करुँगीI किसी का बुरा मैं नहीं कर सकती, लगा एक बकबास डॉक्टर बनने से ज्यादा जरूरी है कि एक अच्छा इंसान बना जायेI दुसरे दिन बापस घर और एक नई मंजिल कि तलाश शुरूI
बचपन में आरोहन और teletubbies देखा करती थी सोंचा यहाँ कोई राह हो शायद मेरे लियेI NDA के written exam clear किये तो पता चला यहाँ मेडिकल exam भी होता है पर ऑंखें मेडिकल exam के entrance दे-दे के पहले ही ख़राब हो चुके थेI मंजिल तो कब से पता थी मुझे पर रास्ते बड़े अजीबो गरीब मिलते गए लेकिन कारवां कहीं रुकता है भलाI
सोंचा स्नातक ही कर लेते हैं फिर science college बालों का पाला मुझसे पड़ाI शुरुआत काफी बोरिंग थी पर कोई ऐसा मिला जिससे जिंदगी खूबसूरत हो गयीI कब मैं लोगों कि चहेती बनी मुझे खुद भी नहीं पताI यहाँ लोगों का स्नेह था तो सब काम आसान लगते थेI काफी adventurous रहा यहाँ का सफ़रI Debate competition, singing competition, dance competition, athletic championship, NSS और ना जाने क्या क्या किया, तीन साल कब गुजर गए पता ही नहीं चलाI फिर साला वही खीच- खीच "करियर" माने वो चीज जिससे आपको पैसे आते हों और आपकी प्रतिष्ठा बढती हो पर खुशियाँ आये ये जरूरी तो नहींI
सारे दोस्तों ने अपनी-अपनी राह पकड़ी और मैं भी अपने नए कारवां कि तरफ चल पड़ी, नया कारवां था patna law college ,सोंचा लोगों को न्याय दिलाउंगी और पैसे व् प्रतिष्ठा भी पाऊँगीI २ महीने ही क्लास किये थे कि मेरी दलीलों से वहाँ के professors त्रश्त हो गए थेI इंडियन पेनल कोड में समाज के लिये कोई सजा ही नहीं है और ना ही सामाजिक कुरीतियों के लियेI अधिनियम पे अधिनियम बनाये जाते है, बच्चे बेफजूल ही याद कर- कर के हलकान तक हो जाते हैं, लेकिन जिसकी सुननी चाहिए उसकी कोई सुनता कहाँ हैI इंसाफ कि देवी अन्धी है सबुत चाहिए होते है वो सिर्फ सुन सकती है बस, पर आत्मा कि पाकीजगी कोई कैसे दिखा सकता है यारI अगर आत्मा निकलेगा तो मर नहीं जायेगा क्या I उस दिन से बड़ा अजीब लगा जब लौ कॉलेज के मेरे अतिप्रिय शिक्षक ने कहा की "अगर सामने बाला मुजरिम है आप जानते हो और आपको उसके पक्ष में लड़ना हो तो आप अपने मन की नहीं उस बादी का पक्ष देखेंगे बिलकुल अंधे होकर,यही सच है क्यूंकि सारी चीजें जैसी दिखतीं है वैसी नहीं है सब बिज़नस हो चुका हैI गवाहों के लिये गीता बाइबल कुरान और गुरुग्रंथ साहिब है पर वकीलों के लिये नहीं और वैसे भी इन्साफ की देवी अन्धी है"I आँखों का अँधा भला पर आत्मा से अँधा होना वो भी जानबूझ कर ये तो बेबकूफी है मैंने दुसरे दिन से कॉलेज जाना बंद कर दियाI
हमेशा दिमाग में आता कुछ अच्छा करना है जिससे किसी का कोई नुकसान ना हो और मेरा भला होI एक दिन माँ कि पासबुक अपडेट कराने बैंक गयी थीI एक बूढी महिला कब से इस टेबल से उस टेबल चक्कर लगा रही थीI मैंने उसे पानी पिलाया और बैठा के पूछा इतना परेशान क्यूँ है वो, पता चला कि उसके पति कि मृत्यु हो चुकी है और जो बचे पैसे हैं वो बैंक से अपने गुजारे के लिये निकलना चाहती हैI लेकिन कुछ nomination कि चक्कर कि बजह से उसे रोज़ दौड़ाया जा रहा हैI मैं चाह के भी उसकी कोई हेल्प नहीं कर पायी तब लगा कि इधर कि तरफ रुख करना चाहिए जहाँ dynamism की जरूरत हैI बैंकिंग की नौकरी साफ सुथरी लगी तो सोंचा लोगों का हेल्प भी कर पाऊँगी सो यही करने की कोशिश करती हूँI ICFAI से पीजी किया बैंकिंग में, और competitive exam के दौड़ में एक और बेरोजगार शामिल हो गया I जब interview की बारी आती तो interviewer को शायद मेरी बेबाकी खल जातीI उन्हें लगता मैं उनके स्वाभिमान की पुंगी बजा रही हुं शायद पर ऐसा नहीं था ये मेरा स्वाभिमान था की कुछ अन्काठी रास नहीं आतीI
बेरोजगारी पे बचपन में लेख लिखने आता था उस वक़्त इतनी समझ नहीं होती की आखिर बेरोजगारी कहते किसे हैं , स्वाभिमानी होना भी अपने आप में दुखद ही है क्यूँ की बहुत जल्दी ही बातें खल जातीं है मन कोI ईश्वर ने कुछ ऐसी राहें भी दीं जो मेरे समझ से परे था की अच्छा है या बुराI रेगिस्तानो में जैसे ओस की बूँद दिखी जब मैंने एक construction कंपनी ज्वाइन कीI ये एक tower infra company थी, vodafone और hutch के tower बिहार और झारखण्ड में लगाने की ठेकेदारी करती थीI काम सीखने का इतना जूनून था की पहले दिन ही मैंने ऑफिस में रात के 10 बजा दिये, लैपटॉप में जोड़ तोड़ करती रहीI वहाँ रिपोर्ट्स बनाने होते थे, Hutch और vodafone के official के साथ मीटिंग attend करनी होती थीI इंजीनियरिंग से दूर दूर का बासता नहीं था फिर भी और सारे इंजिनियर से tower के map पढने सीखे मैंनेI सीखने को काफी मिल रहा था जैसे delta tower ,angular tower, GTT tower , RTT tower बगैरह - बगैरह की तभी एक दिन salary day आयाI उस पल को वयां नहीं कर सकती जब पहली सैलरी मिली थीI माँ को प्रणाम किया और सारे पैसे पैर पे रख दियेI माँ ने एक भी नहीं लिये पर बहुत खुश हुई, मेरी नजरें उतार के कहती है लगता है सुधर गयीI दुसरे ही दिन सबके लिये कुछ ना कुछ ख़रीदा, चाँद के लिये भी एक टाई खरीदी मैंने, लगा वो जब भी मेरे लिये जमीं पे आएगा तो दे दूंगीI कहते हैं जहाँ अच्छाई होती है वहाँ बुराई भी होती है धीरे धीरे बुराईयाँ भी सामने आने लगी पता चला लोग कितनी हद तक selfish हो सकते हैंI इस कारोबार में लोग लगाते एक थे कमाते बीस थे वो भी मक्कारी सेI क्या राजा क्या प्रजा सब के सब मिले हुए थेI शानदार गाड़ियों और high living standard का सच सामने आ रहा था, इतने खोखले निकलेंगे सपने में भी नहीं सोंचा था I रिपोर्ट में दिखाते की tower base और bolt grouting में 3 :1 का अनुपात है और 6:1 भी नहीं होता थाI जब tower गिरने की नौबत होती या फिर कुछ अनहोनी घटती तो किसी सीधे को बकरा बना दिया जाताI लोग ये समझते हैं की अपने घरों में tower लगबाने से पैसे आयेंगे, खुशियाँ आएँगी पर उन्हें अंदाजा नहीं होता होगा की मौत भी आती हैI एक दिन मैनेजेर को लैपटॉप चार्जर मोबाइल डाटाकार्ड सब handover कर दिया और कहा मेरा हिसाब कीजिये मैं चलीI उसने बड़ा समझाया, आखिर तक पूछता रहा की क्या हुआ पर क्या बताती उनको की मैं चुपचाप ये सब नहीं देख सकतीI उसके दुसरे दिन से ऑफिस जाना छोड़ दियाI समय भी घूम- घूम कर एक ही सुई पर अटक जाता है जैसे जिस चीज को छोड़ा था वही फिर सामने आ के खड़ी हो गयी पर इस बार अपनी शर्तों पर काम किया परिणाम अच्छा था की एक turning point आयाI नोकिया बालों ने खुश होकर बहुत अच्छा ऑफर दिया initial salary तीस हजार और DA TA अलग , दुसरे दिन ज्वाइन करना था, पर पता नहीं मन में कुछ खटक रहा थाI रात भर नींद भी नहीं आई कभी बैंक में मिली बूढी महिला नजर आती तो कभी तीस हजार रुपये दिखते तो कभी construction बालों की कमिनापंती याद आती तो कभी लाशों के ढ़ेर पे मेरा महल नजर आताI कभी ये सोंचती की काजल की कोठरी में कब तक कालिफ से बच पाऊँगी, कर लेती हूँI इतना भयानक शायद दूसरा विश्व युद्ध भी नहीं होगा जितना की ये सब मन में तोड़ फोड़ मचा रहे थेI अंतिम क्षणों में वो बूढी महिला की करुण छवि जीत गयीI मैंने decide किया की बैंक में ही नौकरी करनी हैI बस फिर से बेरोजगारी शुरू, की तभी मेहनत रंग लती नजर आईI हमारे यहाँ एक कहाबत है " दूर के ढोल सुहाबने " माने कुछ चीजें जो खूबसूरत दिखतीं हैं जरूरी नहीं की हमेशा खूबसूरत ही हों I ICICI Bank का जॉब भी कुछ ऐसा ही थाI corporate की glamer में रँगा एक ऐसा जाल जिससे निकल पाना निहायत ही मुश्किल है एक ऐसा जाल जो जिंदगी भी ले जाये और जीने का मकसद भीI सुबह की शुरुआत अच्छी हो तो दिल खुश हो जाता है पर यहाँ हर रोज़ शुरुआत मोर्निंग मीटिंग से होती थीI कायदे से होना ये चाहिए था की हम अपनी कंपनी को किस तरह नए ideas से आगे बढाएं इस पर चर्चा होती पर होता कुछ और ही थाI इंसानियत की चरमसीमा पार हो जाती थीI ब्रांच मेनेजर इतने दानवीय ढंग से अपने Juniors को प्रताड़ित करता था कि आत्मा कॉप जाती थीI पहले लगा शायद ये इस ब्रांच में होता होगा पर पता चला सभी जगह का यही हाल हैI अजीब स्थिति थी लोग या तो डर डर के रहते थे या तो चापलूसी कर केI Mother's day, Father's day, Valentine day, Friendship day सुना था मैंने पर यहाँ कुछ और ही डे मनाये जाते थे जैसे CASA डे, गोल्ड डे, मुचुअल फंड डे इत्यादिI ये सारे banking products के नाम हैं जिन्हें बेचने की bombardment सुबह- सुबह BM किया करता थाI मेरे से ये सब करना वैसे ही था जैसे की भीख मांगना,मुझे ये लगता की मैं अपने कुछ innovation से अपने लिये यहाँ रास्ते बना लुंगी वो भी स्वाभिमान के साथI मैं अपने तरीके से काम करना चाहती थी पर ऑफिस पोलिटिक्स ने राह में रोड़े लगा दिये फिर भी अकेले ही रास्तों पर बढती रहीI Work is worship पढ़ी थी कभी पर यहाँ पे Work is dhandha थाI कुछ कसाईखाने ऑफिस के रास्ते में पड़ते थे, ऑंखें मूंद लिया करती थी मैं, पर ऑफिस में लोगों के विश्वास का खून होता थाI जो नैतिक शिक्षा कभी पढ़ी थी वो कटते हुए रोज़ देखती थीI कभी Target के नाम पे employee की गर्दन कटती तो कभी achievement के नाम पे client के विश्वास का खून होताI मेरी मंजिले कभी ये होंगी मुझे यकिन नहीं थाI सपने रेत की तरह उड़ने लगे थेI मैं कैसे देखती रहती चुपचाप , कैसे सहती ये सबI पैसों की चाहत कभी से थी नहीं बस ये रहा की माँ पापा के हिसाब का यानी की दुनियादारी की हिसाब किताब का कुछ करना है पर ये दुनिया मुझे भी selfish बनाती जा रही थी शायदIसोंचने बाली बात है की इंसान अपनी आधी जिंदगी माँ बाप की सुनने में ख़त्म करता है और आधी बाल-बच्चों को सुनाने में, अपनी जिंदगी तो बस खाक में मिला लेता हैI मै ये नहीं कहती की मै सही हूँ या लोग गलत हैं, बस ये चाहती हूँ की मुझे अपने तरीके से अपनी जिंदगी जो जीनी है उसमे कोई दखल ना देI मेरे सपनों को कोई दूसरा ना कुचल के चला जायेI दानव(ब्रांच मेनेजर) से ना डरने की सजा ये होती की सारे काम खुद ही करने पड़ते, बेचारा मेरी खुन्नस दूसरों पे निकालताI मुझे torture करने के बहाने ढूँढता और खुद ही उसकी फट जातीI माँ कभी भूखे रहने नहीं देती थी, यहाँ पता चला की खाना होते हुए भी लोग भूखे कैसे रहते हैI जिंदगी की कुछ कड़वी सच्चाई सामने आ रही थीI वैशाखियों के सहारे चलने की आदत नहीं थी तो एक दिन दानव को resignation थमा दियाI दानव ने सोंचा मैं डर गयी पर मैंने उसे महसूस कराया की डरते तुम लोग हो "AC की आदत तुम्हे होगी शायद पर हम तो परिंदे है खुली हवा में साँस लेते हैं "I उसे लगी एकदम सटाक से तो खुन्नस में उसने BSM को भी डाटने को बुला लिया उसने कहा " atitude दिखाती हो , गांधीगिरी से कुछ नहीं होगा खाक में मिल जाओगी, तुम्हारे जैसे ही गांधीगिरी करते लोग सडको पे ठोकरे खाते हैं"I Mood आ गया मेरा भी उस दिन, दोनों को गांधीगिरी का मतलब समझाया और ये भी बताया की खाख बाले को राख की चिंता नहीं होती अपने देश की मिट्टी ही काफी हैI हाँ पर जो खुद अपनी आत्मा से गद्दारी करेगा वो देश से क्या बफदारी करेगा"I शायद उसे समझ में आ चूका था की ये कुछ उल्लू टाइप इंसान हैI पता नहीं क्या हुआ दानव ने resignation एक्सेप्ट ही नहीं की, कहने लगा तुम्हे जिस तरह से काम करना है वैसे करोI उसके बाद से जब भी वो किसी और को डांटता तो उसके बाद मेरी तरफ देखता था शायद उसे मेरे कहे शब्द याद आते होंगेI उनलोगों का स्मार्ट वर्क का कांसेप्ट था जबकि मेरा हार्ड वर्क का कांसेप्ट थाI employee activities ,quiz contest , drawing competition सब किया , चेहरे वहाँ अब मुस्कुराने लगे थे पर मै अपनी मंजिल से भटकती जा रही थीI वक़्त यु गुम हो जाता था जैसे कभी सुबह हुई ही ना होI ऑफिसरगिरी की कनक निबौरी रास नहीं आ रही थी कि फिर से एक दिन resignation दियाI दानव बोला अब तो सब ठीक है फिर अब क्यूँ जा रही हैंI बड़े भाई की तरह future aspect दिखाने और समझाने कि कोशिश करने लगा पर अपनी thethrology भी बड़ी कमाल की हैI आज उससे कोई बहस नहीं की मैंने बस इतना ही कहा की सोने का पिंजरा रास नहीं आ रहा हैI समझ में नहीं आता स्कूल कॉलेज में नैतिक शिक्षा पढ़ाते क्यूँ हैं, क्यूँ बताते हैं की गाँधी नेहरु के आदर्श, क्यूँ बनाते हैं इंसान जब सब मिट्टी में ही मिलाना होता हैI
मेरा दोस्त कहता था, दो चीजें expectation और limitation अपनी dictionary से मिटा दो खुश रहोगीI आज जब ये भी छोड़ा है तो दुःख हो ही नहीं रहा बस एक नई सुबह की आहट है मन मेंI कुछ रौशनी से भरा हुआ साया है जो लहराता है दिन-रात और मुझे हमेशा शुरू से शुरू करने का साहस देता हैI आज फिर वही दिन है जब अपनी मंजिल की ओर निकलना है नए रास्तों के साथI

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